हरिद्वार, संजीव मेहता। समाज में सभी को शांति और सुरक्षा का एहसास हो, इसके लिए विधि निर्माताओं ने कानून बनाया. कानून के तहत ही सजा का प्रावधान भी रखा गया. जिसमें माफी से लेकर जेल तक की व्यवस्था है. जहां कानून का पालन न हो, उस जगह को जंगलराज की संज्ञा दी जाती है. क्योंकि, जंगल ही एक जगह है. जहां जानवरों के कायदे-कानून नहीं होते, लेकिन एक जगह ऐसी भी है. जहां जानवरों ने कायदे कानून तोड़ने पर उन्हें ‘जेल’ में जिंदगी बितानी पड़ रही है. जी हां, एक ऐसा ‘जेल’ जहां जंगल के खूंखार जानवर कैद हैं. बाड़े में कैद हैं कई खूंखार आदमखोर शिकारी जानवर: करीबन 35 हेक्टेयर में फैला उत्तराखंड वन विभाग का चिड़ियापुर रेस्क्यू सेंटर बना तो घायल जानवरों के उपचार के लिए था, लेकिन अब इसमें पिछले कई सालों से कई आदमखोर जानवर बंद हैं. नजीबाबाद रोड पर बना यह सेंटर 14 आदमखोर गुलदारों का घर है. जहां ये सलाखों के पीछे बंद हैं. इस रेस्क्यू सेंटर में पौड़ी, जोशीमठ, कोटद्वार, हरिद्वार समेत तमाम जगहों से लाए गए वो आदमखोर शिकारी जानवर अब वन विभाग की देख-रेख में पल रहे हैं, जिन्होंने कई लोगों को अपना निवाला बनाया है. इस रेस्क्यू सेंटर में जिन गुलदारों को रखा गया है, उनमें रॉकी, जोशी, मोना, रूबी, दारा और सिंबा जैसे नाम वाले गुलदार शामिल हैं. जबकि, इससे पहले हीना, सुंदर समेत 6 गुलदार अपनी उम्र पूरी करके मर चुके हैं. वन विभाग की एक बड़ी टीम इन गुलदारों की देखरेख में लगी रहती है. वरिष्ठ पशु चिकित्सा अधिकारी डॉक्टर अमित ध्यानी करीब 10 सालों से इन आदमखोरों को अपनी निगरानी में देखभाल कर रहे हैं. जंगल में छोड़ना इंसानों के लिए खतरनाक: डॉ. अमित ध्यानी बताते हैं कि शुरुआत में जब गुलदारों को यहां लाया जाता था, तब उन्हें कंट्रोल करने और उन्हें रखने थोड़ी सी तकलीफ होती है, लेकिन उनकी पूरी टीम उनका ध्यान और रूटीन चेकअप करती है. आपसी तालमेल बनने के बाद जानवरों नेचर में काफी परिवर्तन आ जाता है. अब सभी जानवर बाड़े में रहकर खुश हैं. ये वो गुलदार हैं, जिन्हें अब जंगल में छोड़ा नहीं जा सकता है. क्योंकि, एक बार नरभक्षी होने के बाद इन्हें जंगल में छोड़ना इंसानों के लिए खतरनाक हो जाता है. मोना और दारा की कहानी: बाड़े में बंद एक ‘मोना’ भी है, जो यहां 4 साल की उम्र में लाई गई थी, जो बेहद शर्मीली थी, लेकिन अब वो यहां के माहौल को स्वीकार चुकी है. इसे पौड़ी से लाया गया था. इसने उस दौरान करीब चार लोगों को अपना शिकार बनाया था. आज उसकी उम्र 15 साल से ज्यादा हो गई है. अमूमन जंगल में रहने वाले गुलदार की उम्र 10 या 12 साल होती है, लेकिन यहां पर सभी गुलदार को अच्छा खाना-पीना और समय पर मेडिसिन मिल रही है. इसलिए यहां पर जो गुलदार हैं, वो बिल्कुल स्वस्थ हैं और लंबे समय तक स्वस्थ बने रहेंगे. उत्तराखंड के पोखाल से लाया गया ‘दारा’ भी यहां पर मौजूद है. इसने भी 3 लोगों को अपना शिकार बनाया था, लेकिन अब वो अपना बाकी का जीवन यही बिताएगा. ये काफी एक्टिव है. जबकि, इस वक्त उसका वजन 80 किलो से ज्यादा हो गया है. Post Views: 1,727 Post navigation जिलाधिकारी कमेंद्र सिंह ने सभी बैंकर्स को औद्योगिक विकास हेतु उद्यमियों को सकारात्मक सोच के साथ ऋण उपलब्ध कराने के निर्देश उत्तराखंड,जब अश्लील मैसेज करने वाले सरकारी कर्मचारी का बीच सड़क पर उतरा ‘आशिकी का भूत’, पैर पकड़कर मांगी माफी