रोटी से नींद तक मोबाइल का सहारा, परिवारों के बीच भी बढ़ रही दूरी; सुविधा कहीं आदत और लत तो नहीं बन रही?अमृतसर, 15 सितंबर (संजीव मेहता)। बदलते दौर में टेक्नोलॉजी ने इंसानी जिंदगी को पहले से कहीं अधिक आसान बना दिया है। स्मार्टफोन, 5G इंटरनेट और वाई-फाई आज हमारी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन चुके हैं। पढ़ाई से लेकर मनोरंजन और दुनिया भर की जानकारी तक, सब कुछ एक क्लिक पर उपलब्ध है। लेकिन इसी तकनीकी सुविधा का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल खासकर बच्चों के बचपन, उनकी आदतों और पारिवारिक रिश्तों पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है।कभी बच्चों को रोने पर मां की गोद, प्यार और दुलार से चुप कराया जाता था, लेकिन आज कई घरों में बच्चे के हाथ में मोबाइल थमाना सबसे आसान समाधान बन गया है। सवाल यह है कि क्या हम बच्चों को तकनीक से जोड़ रहे हैं या अनजाने में उन्हें स्क्रीन का आदी बना रहे हैं?रोने पर मोबाइल, खाने के समय कार्टून और सोते वक्त स्क्रीन!आज कई परिवारों में बच्चे खाना खाने से मना करें तो मोबाइल पर कार्टून चला दिए जाते हैं। बच्चा रोने लगे तो उसे चुप कराने के लिए फोन पकड़ा दिया जाता है और रात को सुलाने के लिए भी स्क्रीन का सहारा लिया जाता है।शुरुआत में यह तरीका माता-पिता को सुविधाजनक लगता है, लेकिन धीरे-धीरे बच्चा हर काम के लिए मोबाइल पर निर्भर होने लग सकता है। कुछ बच्चों को मोबाइल के बिना खाना खाने, सोने या कुछ देर शांत बैठने में परेशानी होने लगती है।विशेषज्ञों की सलाह के मुताबिक, बच्चों की उम्र के अनुसार स्क्रीन टाइम तय करना और उन्हें खेल, बातचीत, कहानी सुनाने तथा दूसरी रचनात्मक गतिविधियों में शामिल करना जरूरी है। बचपन में माता-पिता का समय, प्यार और संवाद किसी भी महंगे गैजेट से ज्यादा महत्वपूर्ण है।महंगा मोबाइल देना ही प्यार नहीं, सही संस्कार भी जरूरीबच्चे बड़े होते हैं तो उनकी इच्छाएं और मांगें भी बढ़ने लगती हैं। कई बार दोस्तों के पास महंगे स्मार्टफोन देखकर बच्चे भी उसी तरह का फोन लेने की जिद करते हैं। माता-पिता उनकी खुशी के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से ज्यादा खर्च कर देते हैं।लेकिन असली सवाल मोबाइल की कीमत का नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल का है। बच्चा फोन पर पढ़ाई कर रहा है या घंटों गेम खेल रहा है? वह ज्ञानवर्धक सामग्री देख रहा है या उम्र के अनुकूल न होने वाले कंटेंट में उलझ रहा है?बच्चों को मोबाइल देना ही पर्याप्त नहीं है। उन्हें इंटरनेट के सुरक्षित इस्तेमाल, ऑनलाइन व्यवहार और निजी जानकारी की सुरक्षा के बारे में समझाना भी माता-पिता की जिम्मेदारी है।इंटरनेट ज्ञान का खजाना, लेकिन गलत इस्तेमाल खतरनाकइंटरनेट ने शिक्षा और जानकारी की दुनिया को बच्चों के लिए बेहद आसान बना दिया है। ऑनलाइन कक्षाएं, शैक्षणिक वीडियो, डिजिटल पुस्तकें और नए कौशल सीखने के अवसर इसके सकारात्मक पहलू हैं।लेकिन बिना निगरानी और उचित मार्गदर्शन के इंटरनेट का इस्तेमाल बच्चों को अनुचित सामग्री, साइबर ठगी, ऑनलाइन उत्पीड़न और आर्थिक धोखाधड़ी के जोखिम में डाल सकता है।बीते वर्षों में ऑनलाइन गेमिंग और गेम से जुड़े आर्थिक नुकसान की घटनाओं ने भी चिंता बढ़ाई है। कुछ गेमों और संदिग्ध ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों में पैसे लगाने, इनाम जीतने या जल्दी कमाई करने का लालच दिया जाता है। ऐसे प्रलोभनों में फंसकर लोग आर्थिक नुकसान उठा सकते हैं और परिवार कर्ज के बोझ तले दब सकते हैं।इसलिए बच्चों को यह समझाना जरूरी है कि इंटरनेट पर दिखने वाला हर ऑफर सच नहीं होता। किसी अनजान लिंक पर क्लिक करना, ओटीपी साझा करना या बिना जानकारी के पैसे जमा करना भारी पड़ सकता है।एक ही घर में रहते हुए भी दूर हो रहे परिवारएक समय था जब परिवार के सदस्य शाम को एक साथ बैठते थे, दिनभर की बातें साझा करते थे और बच्चे बड़ों से कहानियां सुनते थे। आज कई घरों में एक ही कमरे में बैठे लोग अपनी-अपनी स्क्रीन में व्यस्त नजर आते हैं।मोबाइल ने दूर बैठे लोगों को करीब लाने में अहम भूमिका निभाई है, लेकिन इसके अत्यधिक इस्तेमाल से पास बैठे लोगों के बीच बातचीत भी कम हो सकती है।बच्चों को सिर्फ मोबाइल से दूर रखने की बात करना पर्याप्त नहीं होगा। माता-पिता को भी अपने स्क्रीन टाइम पर ध्यान देना होगा। यदि घर के बड़े हर समय फोन में व्यस्त रहेंगे, तो बच्चों से मोबाइल का सीमित इस्तेमाल करने की अपेक्षा करना मुश्किल होगा।परिवार में कुछ समय ऐसा जरूर होना चाहिए, जब सभी सदस्य मोबाइल एक तरफ रखकर एक-दूसरे से बातचीत करें।साइबर अपराध में तकनीक का दुरुपयोग भी चिंता का विषयडिजिटल सुविधाओं के विस्तार के साथ साइबर अपराध और ऑनलाइन धोखाधड़ी के खतरे भी बढ़े हैं। व्हाट्सऐप संदेशों, फर्जी कॉल, नकली लिंक और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को निशाना बनाया जा सकता है।बच्चों और युवाओं को यह सिखाना जरूरी है कि वे अनजान लोगों के साथ निजी तस्वीरें, पासवर्ड, बैंक संबंधी जानकारी या ओटीपी साझा न करें। किसी भी संदिग्ध संदेश या पैसे कमाने के लालच वाले ऑफर पर भरोसा करने से पहले उसकी जांच करें।डिजिटल जागरूकता आज केवल जरूरत नहीं, बल्कि सुरक्षा का अहम हिस्सा बन चुकी है।पुराने बचपन की गोद और आज की स्क्रीन में बड़ा अंतरपहले बच्चा रोता था तो मां उसे गोद में उठाती थी, परिवार के सदस्य उससे बात करते थे या खेल के जरिए उसका ध्यान बदलते थे। आज कई बार बच्चे को चुप कराने के लिए तुरंत मोबाइल थमा दिया जाता है।यहां सवाल तकनीक को पूरी तरह गलत ठहराने का नहीं, बल्कि उसके इस्तेमाल के तरीके को समझने का है। मोबाइल बच्चों के लिए सीखने, रचनात्मकता बढ़ाने और दुनिया को समझने का माध्यम बन सकता है, बशर्ते उसका इस्तेमाल उम्र और जरूरत के अनुसार किया जाए।बच्चों के साथ समय बिताना, उन्हें बाहर खेलने के लिए प्रोत्साहित करना, किताबें पढ़ने की आदत विकसित करना और उनकी बात ध्यान से सुनना उनके भावनात्मक और सामाजिक विकास के लिए महत्वपूर्ण है।तकनीक हमारी सहायक बने, जिंदगी की मालिक नहींआज जरूरत इस बात की है कि माता-पिता बच्चों के लिए स्क्रीन टाइम की सीमाएं तय करें, सोने से पहले मोबाइल का इस्तेमाल कम करें और भोजन के समय फोन से दूरी बनाए रखें। बच्चों को ऑनलाइन सुरक्षा के नियम समझाएं और उनकी डिजिटल गतिविधियों पर उम्र के अनुरूप नजर रखें।सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बच्चों को मोबाइल से ज्यादा अपना समय दें। उनके साथ खेलें, बातचीत करें और उनकी छोटी-छोटी खुशियों का हिस्सा बनें।आज अगर हमने बच्चों के हाथ में महंगे मोबाइल देकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान ली, तो कल हमें खुद से पूछना पड़ सकता है कि हमने बच्चों को तकनीक सौंपी थी या उनका बचपन ही उसके हवाले कर दिया था।टेक्नोलॉजी हमारे हाथों में रहे तो वरदान है, लेकिन जब हमारी जिंदगी का हर फैसला स्क्रीन करने लगे, तब यही सुविधा चुनौती बन सकती है। बच्चों का बचपन बचाने के लिए तकनीक को रोकना नहीं, बल्कि उसका सही, सुरक्षित और संतुलित इस्तेमाल सिखाना जरूरी है।दोहराए गए हिस्से हटाकर लेख कसेंशीर्षक और उपशीर्षक अधिक संतुलित करें Post Views: 1,214 Post navigation इतिहास की सबसे रहस्यमयी रानी! जिसकी खूबसूरती ही बन गई अभिशाप, अपनों ने ही रौंद दी जिंदगी